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Aug 2, 2025
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Admin
उपनयन संस्कार का महत्व आज के आधुनिक युग में
उपनयन संस्कार: एक आधुनिक युग में इसका महत्व परिचय:
उपनयन संस्कार, जिसे आमतौर पर जनेऊ संस्कार या यज्ञोपवीत संस्कार भी कहा जाता है, ब्राह्मणों के लिए एक प्रमुख संस्कार है। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आत्मानुशासन, शिक्षा और धर्म के प्रति समर्पण का प्रतीक है। आधुनिकता की दौड़ में जहाँ कई परंपराएँ पीछे छूट रही हैं, वहीं यह जानना आवश्यक है कि उपनयन संस्कार आज भी उतना ही महत्वपूर्ण क्यों है।
उपनयन संस्कार क्या है?
यह संस्कार एक बालक को औपचारिक रूप से गुरुकुल या विद्या अध्ययन के योग्य घोषित करता है। इसमें ब्राह्मण बालक को यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण कराया जाता है और ‘गायत्री मंत्र’ की दीक्षा दी जाती है। इसे ‘द्विज’ यानी दूसरा जन्म भी कहा जाता है।
आधुनिक युग में इसकी आवश्यकता क्यों?
संस्कारों की पहचान:
आज की शिक्षा केवल भौतिक सफलता पर केंद्रित है, लेकिन उपनयन संस्कार आंतरिक विकास और आत्मानुशासन सिखाता है।
आध्यात्मिक जागरूकता:
बच्चे को धर्म, ऋषियों की परंपरा और जीवन के उच्च आदर्शों से परिचय कराया जाता है।
परिवार और समाज से जुड़ाव:
यह एक सामूहिक संस्कार है जो परिवार और समाज को एकजुट करता है, और पीढ़ियों को जोड़ता है।
संस्कृति का संरक्षण:
उपनयन जैसे संस्कार हमारी सनातन संस्कृति को जीवित रखते हैं और ब्राह्मण समाज की जड़ों को मजबूत करते हैं।
बदलते स्वरूप में भी स्थायित्व
आज कई परिवारों में उपनयन संस्कार को केवल औपचारिकता मानकर टाल दिया जाता है, लेकिन यदि इसे सही भावना और ज्ञान के साथ किया जाए, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवनभर की प्रेरणा बन सकता है।
यह आवश्यक नहीं कि बालक को गुरुकुल भेजा जाए, लेकिन घर में ही यदि उसे धर्म, वेद, संस्कार और साधना की शिक्षा दी जाए तो उपनयन सार्थक हो जाता है।
निष्कर्ष:
उपनयन संस्कार हमारी संस्कृति की रीढ़ है। आधुनिक शिक्षा और विज्ञान के युग में भी यह संस्कार बच्चों के नैतिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक है। ब्राह्मण महासभा का कर्तव्य है कि वह इस प्रकार के मूल संस्कारों को प्रोत्साहित करे और समाज को इसकी प्रासंगिकता समझाए।